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चौसठ कला संपन्न श्री कृष्ण



श्रीकृष्ण असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे कृष्ण ने 64 दिन में  जान ली और समझ ली तब गुरू संदीपन ने कहा कि मुझे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास पुराण, शैली विज्ञान, राशि शास्त्र, गणित शास्त्र, विधिशास्त्र ,अर्थशास्त्र, वाकू वाक्य, शास्त्र तर्कशास्त्र, एक आयन नीतिशास्त्र, भूत विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और प्राणीशास्त्र ,ज्योतिष, ललित कला ,आदि विद्याओं का ज्ञान है और यह सभी विद्या मैंने तुम्हें  दे दी हैं अतः अब

तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हो चुकी है और तुम अपने घर वापस लौट सकते हो तब श्री कृष्ण ने गुरु के सामने विनम्र निवेदन किया आपकी कृपा से मुझे सारी विध्याओ का ज्ञान प्राप्त हुआ है लेकिन जब तक मैं इन सभी विध्याओ को सिद्ध नहीं कर लेता तब तक यह विध्याये मेरे लिए अधूरी रहेंगी अतः मैं इन विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त करना चाहता हूं आप मुझे उसका उपाय बताएं संदीपन गुरु मुस्कुराए और बोले श्री कृष्ण अब तुम इन सभी विध्याओ का केवल

अभ्यास करो और उसके बाद इतिहास साक्षी है अगले 3 साल 10 महीने तक श्री कृष्ण इन विध्याओ का अभ्यास करते रहे इसी बीच एक घटना घटित हुई संदीपन ऋषि के आश्रम में उनके पुत्र की अचानक मृत्यु हो गई पुत्र की मृत देह को देखकर ऋषि को बहुत दुख हुआ तब श्री कृष्ण ने गुरु से  सीखी संजीवन विध्या का प्रयोग करते हुए अपनी

सारी देव शक्तियों का आवाहन कर अपने मानस पराक्रम से गुरु पुत्र को जीवित कर दिया यह सब देखकर सांदीपनि ऋषि बहुत प्रसन्न हुए ऋषि ने कठिन से कठिन परीक्षा लेकर श्रीकृष्ण को कई बार परखा हर बार कृष्ण कसौटी पर खरे उतरते थे अंतत गुरु ने उन्हें कई सिद्धियां प्रदान की जिसके माध्यम से श्री कृष्ण कभी भी जीवन में पराजित नहीं हो, वह हमेशा चिरयौवन  बने रहें और सम्मोहक  बने रहे और अपने जीवन में पूर्ण संपन्नता और वैभव प्राप्त कर

सकें इस प्रकार से वह जगत में प्रसिद्ध होते हुए जगतगुरु के नाम से विख्यात है|
वास्तव में ही यह सिद्धियां अत्यंत गोपनीय होती है फिर भी एक गुरु ने अपने शिष्य परंपरा के अनुसार यह सभी साधनाएं योग्य शिष्य को प्राप्त कर  संपन्न कराई यह साधनाएं अत्यंत दुर्लभ है अतः बिना पात्र के इन साधनाओं को देना संभव नहीं है क्योंकि इन साधनाओं का दुरुपयोग भी हो सकता है ऐसी ही एक साधना जिसका नाम है सुदर्शन

प्रयोग जिसके माध्यम से कैसी भी शत्रु  बाधा हो पूर्ण रूप से समाप्त किया जा सकता है यह अत्यंत उच्चकोटि का प्रयोग है और कहते हैं आज तक केवल गिने-चुने योगियों को ही इस प्रयोग को संपन्न करने में सफलता प्राप्त हुई है यह प्रयोग अत्यंत तीक्ष्ण प्रभावकारी एवं तीव्र है अतः गुरु आज्ञा प्राप्त करके ही इस साधना को प्रारंभ करना चाहिए |
जो व्यक्ति शत्रुओं से परेशान हो ,जिनका जीना हराम कर दिया हो, उनके सामने सिर झुकाना पड़ता हो , या मुकद्दमों

या रोगों से परेशान हो, उनके लिए यह प्रयोग अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है|
दूसरे शब्दों में इस बात को बताना संभव नहीं है फिर भी इतना कहना पर्याप्त है जिस दिन से व्यक्ति श्री कृष्ण सुदर्शन साधना को प्रारंभ करता है, उसी दिन से उसे अनुकूल प्रभाव प्राप्त होने लग जाता है साधना सिद्ध होने पर व्यक्ति का व्यक्तित्व ही बदल जाता है उसके चेहरे पर एक तेज व्याप्त हो जाता है जो भी उसके सामने वाला व्यक्ति

शत्रुता रखता है वह समस्त शत्रुता भूलकर समर्पण की मुद्रा में आ जाता है इसके आगे व्यक्ति सभी मुकद्दमों में विजय प्राप्त करता है, शत्रु खुद गिड़गिड़ाकर उसके पैरों में पड़ जाता है और समझौता कर लेता है वर्तमान समय में ऐसा व्यक्ति महाकाल के समान शत्रुओं का दमन करने वाला होता है वह खुद सुदर्शन चक्र रूपी कवच से आबद्ध रहता है और शत्रु के अस्त्र-शस्त्र भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते रोग तो ऐसे साधक के जीवन को स्पर्श भी नहीं कर पाते और वह आजीवन स्वस्थ रहता हुआ समाज में मान सम्मान का अधिकारी होता है|
साधना विधान
साधक को किसी भी शुक्रवार को रात्रि 11:00 बजे के बाद स्नान कर शुद्ध सफेद वस्त्र धारण करना चाहिए अपनी सामने लकड़ी के पट्टे पर सफेद वस्त्र  बिछाकर सबसे पहले गुरु चित्र स्थापित करें उसके बाद गुरु यंत्र गुरु चरण पादुका स्थापित कर ले और साधना में सफलता के लिए हाथ जोड़कर गुरु से प्रार्थना करें

गुरु ब्रह्मा  गुरुर विष्णु गुरुर देवो  महेश्वर: |
गुरु साक्षात परब्रम्ह तस्मे श्री  गुरवे  नमः   ||

इस ध्यान के बाद गुरुचित्र , यंत्र ,और चरण पादुकाओं को जल से स्नान कराएं
ॐ  गुरवे नमः  स्नानं समर्पयामि | ( बोलकर उच्चारण करे )

इसके बाद स्वच्छ वस्त्र से सभी सामग्री को  पौछ कर निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुमकुम, अक्षत, पुष्प,  नैवैध्य, धूप दीप से पंचोपचार पूजन करें

ॐ गुरवे कुमकुम समर्पयामि |
ॐ गुरवे अक्षतान् समर्पयामि |
ॐ गुरवे पुष्पम समर्पयामि |
ॐ गुरवे नैवेद्यं  निवेदयामि |
ॐ गुरवे   धूपम दीपम दर्शयामि |

अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र, यंत्र और पादुका पर घुमाकर छोड़ दें इसके बाद गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें|
इसके बाद चित्र के सामने सुदर्शन चक्र स्थापित करें और फिर उसका पंचोपचार पूजन करें उसके बाद यंत्र के दाहिनी ओर सुदर्शन तरंग गुटका को स्थापित करें गुटका का भी लघु पूजन करने के बाद विजय दर्शनी माला से निम्न मंत्र का 11 माला मंत्र जप करें
मंत्र

ॐ सुदर्शन चक्राय मम सर्वकार्य विजयम  देहि देहि ओम फट |

यह 11 दिन की साधना है साधक को पूर्व की ओर मुंह करके बैठना चाहिए प्रतिदिन एक ही समय पर साधना शुरू करें ब्रम्हचर्य व्रत व्रत का पालन करें और क्रोध से दूर रहें 11 दिन के बाद  12 वे दिन सुदर्शन तरंग गुटिका को अपने शरीर के ऊपर से घुमाकर दक्षिण दिशा में अपने घर से दूर फेंक दें यंत्र व माला को लाल कपड़े में लपेटकर पूजा कक्ष में ही स्थापित कर दें और 21 दिनों के बाद उसे भी किसी नदी या सरोवर में विसर्जित कर दें ऐसा करने पर यह साधना सिद्ध हो जाती है और उसके बाद व्यक्ति हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करता है
      

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