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कर्म फल को समाप्त करने की साधना

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1-त्रिताप  दैहिक ,देविक ,भौतिक
कहते हैं कर्मों के फल को समाप्त नहीं किया जा सकता जो भी व्यक्ति संसार में आता है वह कुछ ना कुछ कर्म  अवश्य करता है और उसके कर्म के अनुसार ही पाप और पुण्य निर्धारित होता है कर्म भी  अनेक प्रकार केहोते 


हैं एक कर्म ऐसे  होते हैं जो शरीर के माध्यम से किए जाते हैं दूसरे प्रकार के कर्म मन के माध्यम से किए जाते हैं जिन्हें मानसिक कर्म कहते हैं कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो हमने पिछले जीवन में किए हुए होते हैं जिनका फल 

भी हम इस जीवन में  भुगतते  हैं यह कर्म करना जीव की विवशता है उसकी यह विवशता मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होती अनादिकाल से ही पाप और पुण्य की विवेचना होती रही है जो कि बड़ा ही कठिन कार्य है 

फिर भी मनुष्य की भावनाओं को लेकर कर्मों का संक्षिप्त विवेचन करना आज के युग में बहुत जरुरी हो गया है सामान्य नजरों से देखा जाए तो जीव जन्म लेने के बाद से ही कर्मबंधन से जुड़ जाता है और प्रतिपल नवीन 

कार्य करना तथा पिछले जन्म के संचित कर्मों के फलों को भोगना जीव की नियति बन जाती है यही नहीं जीव जिस गर्भ से जन्म लेता है और जिस परिवार में जन्म लेता है उसके कर्मों का परिणाम भी  उससे जुड़ा रहता है  
जिसे जीव को भोगना पड़ता है इस प्रकार से यह जीव अनेक प्रकार के कर्म दोषों से ग्रसित रहता है और जब जीव इन दोषों से दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों तापों से मुक्त नहीं हो जाता तब तक वह जीवन में पूर्ण उन्नति 

पूर्ण शांति पूर्ण सुख वैभव को प्राप्त नहीं कर सकता इन तीनों तापों पर विजय प्राप्त करने के बाद ही मनुष्य  ब्रह्मानंद को ,उस परमानंद को  एहसास करता है जिसे पाकर उसका जीवन धन्य हो जाता है 

2-कर्म बंधन मुक्ति साधना
 बंधनों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में एक उच्च कोटि की साधना वर्णित है जिसका नाम है त्रिपुर सुंदरी साधना यह महाविद्या साधना 10 महाविद्याओं में से एक है महादेवी त्रिपुर सुंदरी अपने भक्तों को 

और अपने साधकों के दोषो को दूर करने के लिए प्रतिक्षण तत्पर  रहती हैं इसके माध्यम से पूर्व संचित कर्म दोषों को तथा इस जीवन के कर्म दोषो को या अन्य किसी भी प्रकार के दोषों को जो कि ज्ञात और अज्ञात 

 है को दूर करने में पूर्ण सक्षम है साधना के माध्यम से हमें निर्मलता, श्रेष्ठता, पवित्रता का जीवन प्रदान करने के साथ ही साथ वह सब कुछ प्रदान कर देती हैं जिसका कि वह व्यक्ति आकांक्षी है सोलह पंखुड़ियों के कमल 

दल पर पद्मासन मुद्रा में बैठी देवी त्रिपुरसुंदरी पूर्ण मात स्वरूपा है तथा सभी पापों एवं दोषों से मुक्त करती हुई अपने साधकों को 16 कलाओं से परिपूर्ण कर देती है और उन्हें पूर्ण वर  प्रदान करती है| 
 3-साधना विधान 
यह 1 दिन की साधना है इस साधना को किसी भी शुक्रवार की रात्रि को संपन्न करना चाहिए यह रात्रिकालीन साधना है इसे रात 9:00 बजे के बाद शुरू करना चाहिए और 11:30 के पहले पहले  संपन्न कर लेना चाहिए 

इस साधना के लिए  निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता है
1-सर्वार्थसिद्धि माला  2- पाप विनाशिनी गुटिका  3- गुलाबी आसन और साधक को पहनने के लिए गुलाबी धोती|

 सबसे पहले साधक स्नान आदि से निवृत होकर पूर्व या उत्तर दिशा में लकड़ी के बाजोट पर गुलाबी आसन बिछाकर तांबे की प्लेट में त्रिकोण के रूप में कुमकुम  या सिन्दूर से बिंदिया लगाये  उस त्रिकोण में पापनाशिनी 

गुटिका स्थापित करें इसके बाद धूप दीप पुष्प से उस का पूजन करें इसके बाद गुरु मंत्र की 4 माला जप करें और मन ही मन उस साधना में पूर्ण सफलता प्राप्ति का आशीर्वाद मांगे त्रिपुर सुंदरी का मूल मंत्र शुरुआत 

करने से पहले हाथ में जल लेकर संकल्प करें साधक जिस इच्छा को रख कर यह साधना संपन्न कर रहा है उसे मुंह से बोलकर उच्चारित करें उसके बाद सर्वार्थसिद्धि माला से महादेवी त्रिपुर सुंदरी के मूल मंत्र की 5 

माला मंत्र जप संपन्न करें मंत्र इस प्रकार है| 
मन्त्र 

ह्रीं क ए ई ल ह्रीं  ह स क  ल ह ह्रीं स क  ल ह्रीं 

साधना काल में साधक को  विभिन्न प्रकार के अनुभव हो सकते हैं कभी उसे अपना शरीर हल्का महसूस होगा और ऐसा लगेगा कि उसके सिर से कोई बहुत बड़ा दबाव उतर गया है जैसे जैसे उसके  के पाप दोष समाप्त 

होते जाते हैं उसका समस्त शरीर तथा मस्तिष्क दबाव से मुक्त होता चला जाता है इससे किसी भी प्रकार से परेशान होने की आवश्यकता नहीं है यह स्थिति अपने आप में पूर्णानंद की स्थिति है साधना समाप्ति के बाद 

11 दिनों तक साधना सामग्री को अपने पूजा स्थान में रखे तथा 11 दिन के बाद उस सभी सामग्री को किसी नदी अथवा तालाब या कुएं में विसर्जित कर दे और वापस घर आ जाए इस प्रकार से यह साधना संपन्न होती 

है इसके माध्यम से साधक के सभी कर्म दोष बंधन समाप्त हो जाते हैं क्योंकि आजकल कलयुग में थोड़ा बहुत झूठ का सहारा किसी न किसी रूप में लेना ही पड़ता है जिसकी वजह से हमें दोष  व्याप्त होता है इस प्रकार के 

कई दोषों को दूर करने के लिए हमें इस प्रकार की साधना का सहारा लेते हुए अपने दोषो को पूर्ण रूप से समाप्त कर सकते हैं अतः यह साधना आज के कलयुग में कल्पवृक्ष के समान है

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