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आयुर्वेद द्वारा कुंडली जागरण



 जब हमारे ऋषि-मुनियों ने योगदा मंत्र की विधियों के माध्यम से कुंडलिनी जागरण क्रिया संपन्न की और आध्यात्मिक शक्ति पर नियंत्रण प्राप्त कर समस्त प्रकृति को अपने अधीन करने की क्षमता भी प्राप्त कर 

ली आयुर्वेद के आचार्यों ने इस कुंडलीनी शक्ति को और शादी के माध्यम से प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की मनुष्य के शरीर का सुष्मिता के साथ अध्ययन किया और महर्षियों ने एक अध्ययन के उपरांत कुंडलिनी को इडा पिंगला और सुषुम्ना पर स्थित चक्रों को देखा और पाया कि मानव शरीर 

में ऐसी दिव्य ग्रंथियां है जिनके स्पंदित होने से मानव शरीर को दुर्लभ क्षमताओं को प्राप्त कर लेता है  मनुष्य असंभव को भी संभव कर सकता है अतः ईश्वर ने मानव शरीर की रचना कर उसमें इतनी अधिक शक्तियों को भर दिया हैतब उन आयुर्वेदिज्ञो नहीं सोचा क्यों उस परम प्रभु ने जरूर 

कुछ ऐसी जड़ी बूटियों का निर्माण किया होगा जिसके द्वारा इस कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत किया जा सके जिज्ञासा के कारण उन्होंने एक उपाय खोज निकाला जिसके माध्यम से बहुत सरलता के साथ इस यात्रा को पूरा किया जा सकता है है मानव सभ्यता की प्राचीन चिकित्सा पद्धति 

हैआयुर्वेद मानव सभ्यता की प्राचीन चिकित्सा पद्धति है और इसे आज भी आधुनिक चिकित्सा के मुकाबले ज्यादा श्रेष्ठ माना गया है कुंडलिनी जागरण मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा का मूल आधार है प्राण वायु का संचालन करने के लिए योगियों और महर्षियों ने प्राणायाम भस्त्रिका 

आद्योगिक क्रियाओं का विकास किया संचालन कब तक संभव नहीं है जब तक शरीर की सारी विकृतियां या सारे रोग समाप्त ना हो जाए जब श्वास प्रणाली का और नाड़ियों का पूर्ण रुप से शोधन नहीं हो जाता तब तक शरीर पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं हो पाता इसके लिए हमारे भारतीय 

चिकित्सकों ने मानव शरीर को संचालित करने वाली शक्ति जो मनुष्य की जीवनी शक्ति है उसी को जोगियों ने प्राणी कहा है जो शरीर में पूर्ण रुप से विद्यमान है और शरीर के कण कण में व्याप्त है जब इस प्रवाह प्रक्रिया में कोई रुकावट आ जाती है तभी व्यक्ति रोग ग्रस्त होता हैशरीरों में बात 

पित्त कफ के असंतुलन से अनेक रोग पैदा होते हैं आयुर्वेद के अनुसार आमाशय में पैदा होता है जो पाचन शक्ति रक्त संचार स्मरणशक्ति मल मूत्र का निकास भूख दिल की सामान्य गति हाथ पैरों की पेशियां और संवेदनशीलता को सही प्रकार से कार्य करने की ऊर्जा प्रदान करता है पित्त 

आमाशय बड़ी आंख के मध्य पैदा होता है यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और त्वचा की रंगत Dhadkan जिगर की सक्रियता नेत्रों की ज्योति गुर्दो तथापचे  भोजन से उपयोगी तत्व निकालकर ग्रहण करने में मुख्य भूमिका निभाता है बात अर्थात वायु , यह शारीरिक गतिविधियों में पूर्ण 

सहायक है यह अशुद्धियों को बाहर निकालती है, सांस लेने में, भोजन को मुख से आमाशय तक तथा वहां से मलद्वार तक ले जाने का कार्य इसी  के द्वारा संपन्न होता हैवात-पित्त-कफ यह तो यह तीनो चीज़ है शरीर की अशुद्धियों को निकाल कर रोक पैदा होने से रोकती हैं जब शरीर निरोग हो 

जाता है तब कुंडली जागरण के लिए विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों का प्रयोग शरीर का कायाकल्प किया जाता है जिससे चेहरे पर निखार और आने लगता है यह बिल्कुल सच है कि प्रकृति से एकाकार होने पर प्रकृति अपना भेद बता देती है पौधे और वृक्ष मुखर हो उठते हैं यूं तो भगवान ने 

सभी पौधों में कुछ-न-कुछ शक्ति प्रदान की है मगर कुंडलिनी जागरण हेतु एक विशेष पौधे का निर्माण किया है इस प्रकार के पौधे का ज्ञान किसी एक आद अर्थात किसी विरले को ही है यह अत्यंत ही गोपनीय नुस्खा है जो की अचूक प्रभाव डालने वाला और प्रामाणिक है किरकिटी नाम का  पौधा जो 

कि कश्मीर के  दुर्गम इलाकों में पाया जाता है
यह पौधा लगभग 2 फीट ऊंचा गुलाब की झाड़ियों की तरह बना होता है इसकी जड़ हरापन लिए हुए पीले रंग की होती है इस पर लगने वाली पत्तियां  नीले रंग की होती हैं इसके तंने  पर छोटे-छोटे कांटे पाए जाते हैं 

इस पौधे की एक विशेषता यह है यह पूर्णिमा की रात्रि को ही इस पर फूल खिलते हैं जो पीले रंग के होते हैं साथ ही इन फूलों से प्रकाश किरणें निकलती दिखाई देती है दूर से देखने पर ऐसा आभास होता है जैसे छोटे-छोटे जुगनू चमक रहे हो पूर्णिमा के बाद से इन पर फल निकल आते हैं जो 

नीम के फलों की तरह छोटे-छोटे फल होते हैं पूर्णिमा आने के दो-तीन दिन पहले ही यह फल  नीचे गिर जाते हैं इस अति दुर्लभ पौधे को पूर्णिमा की रात्रि के अतिरिक्त अन्य किसी समय नहीं  पहचाना जा सकता इस पौधे के पंचांग अर्थात फल ,तना, फूल,फल व पत्ती को लेकर सुखा लेना चाहिए  
और इस पंचांग  को ग्वारपाठे के रस में मोती वा शुक्ति i भस्म मिलाकर 12 घंटे तक घोटा  जाता है इसके बाद यह हरे रंग में परिवर्तित हो जाता है इस औषधि को 15 दिन तक  सेवन करने से शरीर में व्याप्त वात, पित्त और कफ तीनों के संतुलन स्थापित हो जाते हैं  शरीर में सभी व्याधियां  

दूर हो जाती हैं और प्राण वायु शुद्ध होकर तीव्रता के साथ शरीर में बहने 
लगती है इस प्राणवायु के प्रभाव से समस्त चक्रों को जागृत करने में सहायता मिलती है इस औषधि का लेप दवा सेवन के साथ ही चक्रों के निर्धारित स्थान पर करना अनिवार्य है इस प्रकार इस औषधि का सेवन 

और लगाने की दोनों प्रक्रियाओं से पूर्णमद: पूर्णमिदम होने की क्रिया संपन्न होती है जोकि मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा को पूर्ण करने का सफलतम आधार है और इस प्रकार से कुंडलिनी जागरण में पूर्ण सहायक है

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