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ईश्वर को खोजना नहीं खोदना पड़ता है

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एक व्यक्ति जो ईश्वर को खोजना  चाहता थालेकिन कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था ईश्वर को किस प्रकार खोजें ?तब वह व्यक्ति एक फकीर की शरण में गया और बोला बाबा मुझे ईश्वर को प्राप्त करने का रास्ता 

बताइए तब फकीर ने समझाया ईश्वर कोई वस्तु नहीं है वह तो आलोक, प्रसन्नता, आनंद, प्रेम और आत्मा की चरम अनुभूति का नाम है वह कोई 

व्यक्ति नहीं है उसे कहीं बाहर पाए पाया जा सके वह तो स्वयं की चेतना है हमारे स्वयं के अंदर ही बैठा हुआ है उसे खोजने कहीं दूर नहीं जाना पड़ता यह तो एक अंदर की यात्रा है जितना ज्यादा अंदर घुसते चले जाएंगे और 

गहराई मैं नीचे उतरते चले जाएंगे तब वह ईश्वर हमें अंदर बैठा दिखाई देगा इस व्यक्ति ने फकीर से पूछा क्या वास्तव में ईश्वर है अगर है तो हमें दिखाई क्यों नहीं पड़ता? तब फकीर ने कहा ईश्वर कोई वस्तु नहीं है वह तो  
अनुभूति है उसे देखने का कोई उपाय नहीं हां उसे अनुभव जरूर किया जा सकता है किंतु जिज्ञासु व्यक्ति उनके उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ उसकी आंखों में अब भी वही प्रश्न वैसे का वैसा खड़ा था फकीर को समझते 

हुए देर नहीं लगी और उन्होंने पास में पड़ा हुआ एक पत्थर उठाया और अपने पैर पर जोर से मारा उनके पैर को काफी चोट लगी और उसमें  से रक्त की धार बहने लगी वह व्यक्ति बोला यह आपने क्या किया बाबा इससे तो  
बहुत पीड़ा  हो रही होगी आपको यह कैसा पागलपन  किया  आपने ?यह देख कर फकीर हंसने लगा और बोला बेटा पीड़ा दिखती नहीं फिर भी होती जरूर है, इसी प्रकार से प्रेम दिखाई नहीं पड़ता फिर भी होता जरूरी है. ऐसा  
ही मेरा ईश्वर है कि वह दिखाई नहीं देता मगर होता जरूर है | वास्तव में जीवन में जो कुछ दिखाई पड़ता है वह सब उसी ईश्वर की सत्ता है और जो कुछ दिखाई नहीं पड़ता है वह  दृश्य से अदृश्य की सत्ता और भी 
om: Man meditating in an imaginary landscape. Chakra points visible on his body. Digital illustration.
ज्यादा गहरी होती है क्योंकि उसे अनुभव करने को स्वयं के प्राणों की गहराई में उतरना पड़ता है तभी वह ग्रहणशीलता उपलब्ध हो पाती है जो कि उसे 

स्पर्श और प्रत्यक्ष कर सकने में समर्थ होती हैं उस सत्ता को साधारण आंखों से नहीं देखा जा सकता उसे जानने के लिए तो अनुभूति की गहरी संवेदनशीलता लानी 

पड़ती है तभी ज्ञात हो पाता है अतः उसे बाहर नहीं लिखा जा सकता वह तो भीतर है वह तो देखने वाले में ही छुपी हुई है वास्तव में ईश्वर को खोजना नहीं पड़ता बल्कि खोदना पड़ता है जो व्यक्ति स्वयं अपने हृदय के 

अंदर नीचे और नीचे उतरता चला जाता है या कहे खोदता चला जाता है उसे उस प्रभु की सत्ता का आभास हो जाता है जिस प्रकार अगर हम कोई गड्डा खोदें और उस जगह पर 50 फुट पर पानी है और हम 5 फुट पहुंचने 

के बाद ही खुदाई बंद कर दें और फिर दूसरी जगह  गड्ढा खोदने लगे और इसी प्रकार बार-बार करते रह तो हमें कभी भी पानी प्राप्त नहीं होगा इसकी जगह अगर हम लगातार एक ही जगह गड्ढा खोदते रहें तो हमें 50 फुट 

खुदाई होते ही पानी मिल जाएगा इसी प्रकार हम अपने हृदय में एक ही जगह चित् लगाकर या मन लगाकर बराबर नीचे खोदने की क्रिया या उतरने की क्रिया करते रहें तो निश्चित ही हमें ईश्वर के  दर्शन प्राप्त हो जाएंगे  
यह सब सुनकर उस व्यक्ति की समझ में आ गया और उसकी ईश्वर को खोजने की यात्रा पूर्ण हुई अब उसने इसी मार्ग का अनुसरण करते हुए एहसास किया कि वह 

ईश्वरीय सत्ता जिसे वह बाहर खोज रहा था उसे अपने अंदर ही प्राप्त हो गई है| 

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