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sury grahan का लाभ कैसे उठाये

sury grahan
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sury grahan के माध्यम से अनेक लाभ प्राप्त किए जा सकते है सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है और समस्त जीवो की आत्मा सूर्य ही है क्योंकि सूर्य के माध्यम से ही इस पृथ्वी पर जीवन पनपता है इस तथ्य को सभी जानते हैं और यह एक सर्वमान्य सत्य है वैदिक काल में है हमारे पूर्वज 

सूर्य को ही सारे जगत का पालनहार और कर्ता-धर्ता मानते थे क्योंकि यह सभी को प्रेरणा देने वाला सभी को प्रकाश देने वाला सभी विद्याओं का ज्ञान होने के कारण यह सर्वकल्याणकारी है ऋग्वेद में भी सूर्य को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है क्योंकि सूर्य ही वह परम तत्व है जो संसार के 

समस्त चीजो के निर्माता कांति को प्रदान करने वाले हैं सूर्य ही विराटपुरुष और आदिदेव मने जाते रहे हैं जिनकी साधना और उपासना करने से समस्त रोग जिसमें नेत्ररोग और ग्रह बाधा संबंधित रोग पूर्ण रुप से दूर किए जा सकते हैं क्योंकि सूर्य केवल पृथ्वी को ही नहीं वरन चंद्र, मंगल, 
बुध, गुरु, शुक्र, शनि आदि  को भी उचित मात्रा में पूर्णता प्रदान करते हुए इस सृष्टि को संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं जितने भी नक्षत्र, करण, योग, राशियां, आदित्य  गण, वसुगण, रूद्र , अश्वनी कुमार, वायु, अग्नि, शुक्र, प्रजापति समस्त भूर्भुव: स्व:, आदिलोक,  संपूर्ण पर्वत, 

नदियां, समुद्र तथा समस्त भूतों का समुदाय है इन सभी के कारण और हेतु सूर्य को ही माना गया है हमारी शास्त्रों में मान्यता है कि होली, दीपावली, महाशिवरात्रि, और नवरात्रि अपने आप में सिद्ध मुहूर्त हैं परंतु उनके साथ ही साथ ग्रहण काल चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों को साधना के  
लिए सबसे अधिक उपयुक्त और महत्वपूर्ण मुहूर्त माना गया है इस समय पृथ्वी और पृथ्वी पर ग्रहण काल एक विशेष प्रभाव से युक्त रहता है इसलिए इस समय में कोई भी व्यक्ति साधना या मंत्र जाप या किसी भी प्रकार का अनुष्ठान करता है उसका प्रभाव तत्काल मिलता है इसलिए इस 

समय का अनुकूल प्रभाव 
समय का उपयोग अवश्य ही करना चाहिए क्योंकि इस समय किया गया  कार्य हजार गुना और उससे भी आगे बढ़ कर लाखो गुना फल प्रदान करता है इसका मतलब यह हुआ कि आज हम ग्रहण काल में एक माला मंत्र जाप करते हैं तो वह 1000 माला के बराबर या 10,000 माला के बराबर फल 

प्रदान करने में सक्षम होती है यह इस बात के ऊपर निर्भर होता है कि ग्रहण काल कितना तीव्रता है ग्रहण काल की मात्रा जितनी अधिक होगी उसी के अनुसार फल की प्राप्ति भी होगी इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि हम 100 वर्ष की साधना तपस्या का फल मात्र आधे घंटे के मंत्र जाते ही 

प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि इस समय सूर्य पृथ्वी के अत्यंत निकट होता है जिसके कारण अनंत ऊर्जा का प्रस्फुटन होता है जिसके परिणाम स्वरुप इस समय किए गए कार्य की मात्रा हजारों गुना बढ़ जाती है और उसका प्रभाव हमें तत्काल प्राप्त होता है इसीलिए तो बड़े से बड़ा योगी, यति, सन्यासी 
इस महत्वपूर्ण काल की प्रतीक्षा करते रहते हैं और इस क्षण विशेष को पकड़कर साधना करते हुए अपनी तपस्या उर्जा को प्राप्त करते हैं जिसके कारण उन्हें विशेष प्रकार की लक्ष्य सिद्धि प्राप्त करने में पूर्णता प्राप्त होती है यह हमारे भारतवर्ष की विशेषता है कि हमारे ऋषि मुनियों ने ग्रहण काल  
पर की जाने वाली अनेक साधनाओ  का निर्माण किया है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में सभी बाधाओं और परेशानियों से मुक्त होते हुए उच्चकोटि की स्थितियों का निर्माण करके आध्यात्मिकता  की ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकें जो कि विलक्षण कही गई है आज के समय में मानव के 

पास बहुत कम समय है क्योंकि उसका सारा समय व्यापार नौकरी करते हुए अपने परिवार के पालन पोषण में चला जाता है वह इतना समय नहीं निकाल पाता कि वह योग की उन क्रियाओं को कर सके जिनमे बहुत अधिक समय की आवश्यकता होती है इसलिए ग्रहण काल ऐसा समय है 

जिसमें बहुत थोड़े से समय में बहुत बड़े समय को समेटा जा सकता है और थोड़े से समय में ही उन साधना और तपस्या को किया जा सकता है जिन्हें करने के लिए कई कई वर्ष लग जाते हैं इसलिए ग्रहण काल अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण अर्थवत्ता लिए हुए हैं जिसका उपयोग करके कोई भी 

मनुष्य उच्च कोटि की साधना को संपन्न कर सकता है जो कि शास्त्रों में वर्णित है सूर्य को हमारे शास्त्रों में बहुत अधिक महत्व दिया गया है क्योंकि इन्ही से यह जगत स्थित रहता है दूसरे अर्थ में यह बात अपने प्रमाणित होती दिखाई पड़ती है  सूर्य के उदय होने पर सभी का उदय होता है और 
सूर्य अस्त होने पर सभी अस्त व्यस्त हो जाते हैं इन सभी बातों का तात्पर्य है सूर्य इतने अधिक श्रेष्ठ देवता है कि उनके जैसा कोई दूसरा श्रेष्ठ देवता नहीं है और ना ही आगे भविष्य में होने की संभावना प्रतीत होती है उनके बारे में यह भी कहा जाता है यह जगत इन्हीं के कारण उत्पन्न होता है 

और अंत समय में इन्हीं में लय हो जाता है यह बिल्कुल स्पष्ट है सूर्य में अनेक प्रकार की अद्भुत शक्तियां होती है और ग्रहण काल में सूर्य अपनी पूरी क्षमता से इन शक्तियों को इन रश्मियों को विकिरण करता है इस प्रकार की शक्तियों को ध्यान साधना के द्वारा पूर्ण रूप से प्राप्त किया जा  
सकता है लेकिन यह उतनी ही मात्रा में शक्ति प्राप्त हो पाती है जितने की हमारे शरीर में क्षमता होती है क्योंकि ग्रहण का शाब्दिक अर्थ अंगीकार करना या स्वीकार करना होता है हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत सारा ज्ञान हमारे सम्मुख रखा है उन्होंने बताया ज्ञान से ज्ञान प्राप्त करना ही मनुष्य 

के जीवन की सार्थकता है व्यक्ति को अपने भीतर के अंधकार को मिटाने के लिए पूर्ण रूप से देवी आराधना, पूजा अर्चना, तपस्या, साधना इत्यादि इस प्रकार के विशेष अवसरों पर करते रहना चाहिए जैसा कि ग्रहण काल में अनेक प्रकार की उत्तम योगिक क्रियाएं आदि का विशेष महत्व है 

जिसके कि शास्त्रों में अनेक प्रमाण विद्यमान हैं ग्रहण काल के समय मंत्र जप साधना करने पर व्यक्ति में आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और sury grahan के ग्रहण काल की अवधि में अपनी आंतरिक शक्तियों को साधना बल से निश्चित रुप से सरलतापूर्वक जाग्रत किया जा सकता है इस समय 

साधना करने से अंतर्मन में व्याप्त क्रोध, क्लेश, घृणा जैसे अंधकार को जड़ मूल के साथ समाप्त करने के लिए यह समय अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है |
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