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ध्यान शांति का महासागर है

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अपनी चेतना के साथ क्रियाशील हो जाना ही dhyan है ध्यान में मनुष्य की चेतना एक अलग स्तर पर पहुंच जाती है जिस स्तर को हमने पहले कभी महसूस नहीं किया होता तभी तो ध्यान में बहुत से लोग अपने आप को हवा में अनुभव करते हैं और बहुत से लोग अपने आप को शून्य जैसी इस स्थिति में महसूस करते हैं किसी को स्वप्नलोक में जाने का एहसास होता है, कोई सब कुछ भूल जाता है इस प्रकार से ध्यान में जाने पर अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है कि व्यक्ति को 

ध्यान के समय अपने नेत्र बंद कर लेने चाहिए क्योंकि ऐसा करना शुरुआत में आवश्यक होता है क्योंकि हमारे नेत्र बराबर कुछ ना कुछ देखते रहते हैं और देखने की स्थिति में उन्हें या तो आकर्षण होता है या विकर्षण महसूस करते हैं इसलिए शुरुआत की स्थिति में ध्यान के लिए अपने सामने किसी ईश्वर का चित्र या अपने गुरु का चित्र लगाना आवश्यक होता है या आप जिसे भी मानते हैं उसका चित्र लगाना आवश्यक हो जाता है इस प्रारंभिक अवस्था में माला फेरना या मुंह से मंत्र बोलना आवश्यक होता है लेकिन 
जब हम ध्यान की अवस्था में उतरते हैं तब अपने नेत्र बंद करके अपनी संपूर्ण चेतना के साथ भीतर उतर जाते हैं और अपने भीतर के संसार को देखने लगते हैं वहां पर जो अनुभूति होती है वह विशेष प्रकार की होती है हमारे ऋषियों ने इसे अंतर ज्ञान की संज्ञा दी है बाहर का ज्ञान तो हमें बहुत होता है लेकिन अंदर का ज्ञान उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है जहां ध्यान भीतर का ज्ञान है या स्व का ज्ञान है इसी स्व के साथ आनंद होने की क्रिया जुड़ी हुई है शुरु शुरु में ध्यान लगाने में भी कष्ट की 

अनुभूति होती है क्योंकि आज तक हम आंखों के माध्यम से सब कुछ देखते समझते हैं लेकिन जब आंखें बंद करते हैं और शांत भाव से बैठते हैं तो कुछ बेचैनी सी महसूस होती है लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास के माध्यम से अपने अंदर ध्यान क्रिया का अभ्यास करने लगते हैं तब धीरे-धीरे आनंद की स्थिति शुरु होने लगती है ध्यान शुरू करने से पहले हमें ॐ की ध्वनि का उच्चारण कानों को बंद करके दोनों उंगलियों को माथे पर रखकर गुन्ज्जरण करते हुए करना चाहिए यह क्रिया हमारे प्राण तत्व को हमारे बाहरी तत्वों से जोड़ती है | 

शांति का अहसास 
 और इस क्रिया से हमारे विचार और चित्त एकाग्र होने लगता है कुछ ही क्षणों में शांत भाव आ जाता है और हमें परम शांति का अनुभव होने लगता है हमारे शास्त्रों में वर्णन आया है जब नारद ने गुरु ऋषि सनतकुमार से पूछा कि मुझे dhyan के माध्यम से पूर्ण लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा तब सनत कुमार ने कहा नारद तुम्हारा लक्ष्य शांति प्राप्त करना है उसके लिए ध्यान से सहयोग अवश्य प्राप्त होगा लेकिन dhyan परम लक्ष्य नहीं है उसके ऊपर एक और चीज है जिसे विज्ञान कहा गया है जब तुम 

अपने ध्यान को विज्ञान तत्व से जोड़ लोगे तभी तो मैं पूर्णता प्राप्त होगी तब नारद ने पूछा गुरुदेव मैं नहीं समझ पा रहा हूं ज्ञान और विज्ञान में अंतर कैसे करूं मैं तो समझता था की सांसारिक ज्ञान विज्ञान है और आध्यात्मिक ज्ञान असली ज्ञान है मैं तो शांति की खोज में लक्ष्य से आपके पास आया हूं अब तक मैंने मन, संकल्प, वाणी, भावना, dhyan, अनुभूति के बारे में आप से समझ लिया है लेकिन ऐसा कैसे संभव है कि ध्यान से भी ऊपर विज्ञान है ऋषि सनत कुमार जी ने उत्तर दिया देखो नारद संसार के 
सारे प्राणी अगर गलत दिशा में जा रहे हैं तो क्या तुम भी उनके पीछे उसी दिशा में चल दोगे? नारद ने कहा नहीं मैं तो सही रास्ते पर जाऊंगा तब ऋषि ने कहा तो बताओ सही मार्ग कौन सा है क्या तुमने जो देखा-समझा वही सही मार्ग है या तुमने जो जानकारी प्राप्त की वह सही है? यह तुमने जो ध्यान में अनुभूतियां प्राप्त की वह सही है या गलत इसका निर्णय कौन करेगा? उन्होंने आगे कहा नारद इसका निर्णय तुम्हें ही करना पड़ेगा जिस आधार पर तुम यह निर्णय करोगे उसी को विज्ञान कहते हैं विज्ञान का 

वास्तविक अर्थ है उस स्थिति को पूरी तरह से समझ लेना, उससे पूर्ण जानकारी प्राप्त करना और तुम्हारे स्वयं की अनुभूति में जो विचार आए हैं उन्हें निरीक्षण करना उनका विश्लेषण करना और जो तुम्हारी अनुभूति तुम्हारे अनुभव के आधार पर होती है वह अच्छी या बुरी दोनों प्रकार की हो सकती है तुम्हें ध्यानपूर्वक एकाग्रता के साथ उस पर विचार करना होगा तभी तो सत्य तक पहुंच सकते हो जब तक तुम पूरे विषय को नहीं समझोगे तब तुम अपने आप को कैसे समझ पाओगे ?

तुम्हारा लक्ष्य तत्व ज्ञान प्राप्ति 
dhyan का  विश्लेषण किए बिना तुम उस मूल बिंदु तक नहीं पहुंच सकते यह ठीक बात है कि तुम्हारे पास एकाग्रता है लेकिन तुम अपनी एकाग्रता को किस बिंदु पर ले जा सकोगे उस बिंदु का निर्णय कौन करेगा वह जो लक्ष्य बिंदु है वही विशुद्ध तत्व है वह तो तुम्हें विज्ञान के माध्यम से ही प्राप्त होगा इसीलिए ईश्वर को भी विज्ञान स्वरूप कहा गया है जो पूर्ण विश्लेषण के बाद विशुद्ध है वही पूर्णत्व का स्वरूप है विज्ञान घनानंद का शास्त्रों में बार-बार उल्लेख आया है इसलिए विज्ञानमय होकर dhyan में 

पूर्णता प्राप्त करते हुए उस तत्व को प्राप्त किया जा सकता है तभी जीवन में परम शांति का अनुभव प्राप्त होता है जिस चीज को भी तुम जानना चाहते हो, जिस शांति की तलाश तुम कर रहे हो उसके लिए तुम्हारे मन में एक भावना होनी चाहिए उसके प्रति एक विश्वास होना चाहिए और पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए तभी तुम्हारे हृदय में उसके प्रति एक अनुभूति का भाव आ सकेगा जिसके हृदय में भावना नहीं होती उसी व्यक्ति को क्रूर कहा जाता है इस संसार में सभी प्राणी ज्ञान से परिपूर्ण है सब में कुछ ना कुछ 
ज्ञान अवश्य होता है लेकिन यदि वह भावना शून्य हो जाएं तो क्या होगा हम सब अपने घर परिवार संतान समाज को भावना के आधार पर ही तो प्रेम करते हैं और उस भावना के आधार पर कभी लड़ाई होती है तो कभी प्रेम होता है इसलिए यह सारा संसार भावना का विस्तार है तभी तो इसे भवसागर कहा गया है जब हम किसी स्थान पर बैठे होते हैं और हमारी भावना जागृत नहीं होती तो वह स्थान भी हमें काटने को दौड़ता है यदि आपका किसी से विरोध हो जाता है तो आपकी उसके प्रति भावना समाप्त 

हो जाती है उसके प्रति जो सद्भावना होती है वह दुर्भावना में बदल जाती है जब आप अपनी संतान से प्यार करते हैं, आप अपने इष्ट से प्यार करते हैं, कृष्ण को प्यार करते हैं, शिव को प्यार करते हैं यह केवल और केवल भावना के कारण होता है और इस भावना का रूप ही विश्वास और श्रद्धा है यह बात बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भावना के इस सागर में ही मन, ज्ञान, संकल्प, शास्त्र, वाणी सब कुछ भ्रमण करते रहते हैं इसलिए मन को शांत करते हुए ध्यान के माध्यम से पूर्णता प्राप्त करने का सभी को प्रयास करना चाहिए |

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