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जीवन में अनंतता कैसे बनाये





jivan me anantta के लिए व्यक्ति केवल शरीर से ही नहीं मन के ऊपर आए हुए दोषों का निराकरण करने के बाद उस व्यक्ति को कर्मशीलता का अनुपालन करके शक्ति को जागृत कर व शक्ति का विकास करके अनंत की ओर, एक विश्वास की ओर ले जाता है वह लघु से विराट बनने की ओर धरती से आकाश की ओर बड़ी ही सहजता के साथ अनंत को प्राप्त करने की क्रिया में संलग्न हो जाता है ईश्वर की अनंत स्वरूप की साधना करने से चिंतन मनन ध्यान पूजा-पाठ करने से ईश्वर के  अनंत फल की प्राप्ति होती है इससे व्यक्ति के जीवन का निर्माण शीघ्र गति से होता है और उसे ऐसी शक्ति प्राप्त होती है जिससे वह ईश्वर का सानिध्य प्राप्त करता है शास्त्रों में विशेष उल्लेख प्राप्त होते है कि मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की  बधाये ,अडचने इसीलिए आती है क्योकि हम पूर्ण रूप से पवित्र और शुद्ध नहीं है और हमारे जीवन में पाप ,दोष व्याप्त है

दोषों की समाप्ति
निरंतर साधना करने से पाप दोषों का शमन हो जाता है जिसके कारण व्यक्ति का मन चैतन्य और शुद्ध हो जाता है फलस्वरूप चेहरे पर एक तेजस्विता का भाव आ जाता है उसकी वाणी में ओज ,द्रढ़ता,अवं स्पस्टता आकर जीवन सभी तरह से सफलता की ओर अग्रसर होने लगता है व्यक्ति के जीवन को महान बनाने के लिए गुरु तत्व का होना आवश्यक है बिना इसके व्यक्ति के जीवन में पुरुष से पुरुषोत्तम बनने की क्रिया प्रारंभ नहीं हो पाती जब व्यक्ति साधना करते हुए इष्ट से एकाकार होता हुआ साधना संपूर्ण करता है तब तत्क्षण साधक के चेहरे पर तेजस्विता और प्रेम की भावना में वृद्धि होती है और उसकी मनोकामना पूर्ण करने में यह पूर्ण रूप से सक्षम होता है कई बार तो साधना करने के बाद कुछ दिनों बाद सफलता मिलती है और कई बार साधना समाप्त होते होते उसके कार्य की पूर्ति के समाचार प्राप्त होने लग जाते हैं किसी भी कार्य की पूर्णता गुरु के आशीर्वाद के बिना संभव नहीं है अतः व्यक्ति को सबसे पहले गुरु का विधिवत पूजन अवश्य ही संपन्न करना चाहिए वैसे भी अपने दैनिक पूजन में गुरु के चित्र, पादुका, यंत्र अथवा विग्रह का पूजन करके स्वच्छता के साथ अपने सामने स्थापित करके दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव से पूर्ण सफलता की प्रार्थना  करनी चाहिए तब व्यक्ति के सभी कार्य सहज रुप से पूर्णता प्राप्त करने लगते हैं

प्रेम भाव

गुरु से एकाकार होने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति पूर्ण मनोभाव से अश्रुपूरित नेत्रों से गदगद हृदय से गुरु चरणों में अपनी प्रार्थना रखें और जो भी उसकी सामर्थ्य हो उसके अनुसार वह उनको धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, प्रदक्षिणा समर्पित करें इस प्रकार से पूर्ण रुप से समर्पित होकर किए गए कार्य को निश्चय ही गुरुदेव स्वीकार करते हैं तब व्यक्ति के अंदर व्याप्त दोषों को दूर करते हुए अपनी तपस्या  के अंश को प्रदान करते हैं  जिससे व्यक्ति के सारे पाप दोष, पूर्व जन्म के दोष निवारण होकर एक नया जीवन प्राप्त होता है और उसके बाद उसे निरंतर सफलता प्राप्त होती रहती है यह सब गुरु के प्रति आस्था, श्रद्धा और प्रेम भाव रखने का परिणाम है यह प्रेम एक ऐसा तत्व है जिसके माध्यम से ईश्वर व्यक्ति के पास खिंचा चला आता है इसके लिए व्यक्ति को अपने मन से, प्रेम के साथ श्रद्धा से अंतर्मन के तार जोड़ने पड़ते हैं जिसके माध्यम से व्यक्ति ईश्वर से उस तत्व को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है इसे प्राप्त करके उसके जीवन के सभी शाप ,ताप संताप मिट जाते हैं उसके कई-कई जीवन की प्यास मिट जाती है जीवन में एक शांति उतर आती है, एक दिव्य आलोक उतर आता है  और मनुष्य वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है जिसकी उसे कामना होती है इस स्तर तक पहुंचना कोई मामूली कार्य नहीं है इसके लिए गुरु संगति शास्त्रों का अध्ययन संतों के प्रवचन धार्मिक यात्राएं अनुष्ठान साधनाएं सभी अपने अपने प्रकार से सहयोग करती है धीरे धीरे संस्कार पल्लवित होते हुए मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त करता है जहां गुरु और ईश्वर की याद आते ही प्रेम से हृदय भर आता है कंठ गदगद हो जाता है और मनुष्य के भाव आंसुओं के माध्यम से अपने इष्ट के चरणों में बहने लगता यही तो सच्ची पूजा है इस अवस्था के आने के बाद मनुष्य पूर्ण रुप से समर्पण करता हुआ है अपने  ईश्वर के हृदय में स्थान प्राप्त कर लेता है और उसके बाद उसका जीवन दिव्य आलोक से भर जाता है इसीलिए तो प्रेम को सर्वोपरि माना गया है, प्रेम को दिव्य माना गया है|
अनुपम आलेख 


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