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सबसे बड़ा बल क्या है


 बल
बल

बल  जीवन में अत्यंत आवश्यक वस्तु है जो भी वीर होता है वह धरती के आनंद को भोगता है वही भौतिक आध्यात्मिक सभी प्रकार के आनंद प्राप्त करता है इसके लिए ज्ञान विज्ञान शास्त्र संकल्प अनुभूति और चेतना तत्व का होना अत्यंत आवश्यक है यदि तुम गुरु के मार्ग पर चलना चाहते हो और यह चाहते हो तत्वमसि भाव को समझें और इसे अपने अंदर स्थापित करें तो तत्वमसि भाव को अपने अंदर स्थापित करना होगा बलहीन व्यक्ति  
को कायर कहते हैं जब वह कर्म पथ से हट जाता है तब वह संकल्प विहीन हो जाता है उसका ध्यान विचलित हो जाता है और उस व्यक्ति का संपूर्ण 
विश्वास हिल जाता है वह शास्त्रों को भी भूल जाता है और अपने ज्ञान को भी भूल जाता है इसलिए अपने आत्मिक बल को जागृत कर अपने शारीरिक और मानसिक बल को प्रबल करना चाहिए अगर हम सोचे बल की उत्पत्ति कहां से होती है यदि कोई व्यक्ति बहुत पढ़ा लिखा है लेकिन 

कायर है तो ऐसा व्यक्ति किसी भी काम का नहीं है और यदि कोई व्यक्ति साधना करता है लेकिन भावना से शून्य हैं ऐसे व्यक्ति को की साधना में सफलता प्राप्त नहीं होती इन सब को बलहीन कहा जा सकता है संसार में किसी का अपमान तभी होता है जब कोई बलहीन होता है तत्वमसि क्रिया बल प्राप्त करने की क्रिया है जो बल तुम्हारे अंदर है तुम्हारे शरीर में तुम्हारे मन में तुम्हारी आत्मा में उस पल को संकल्प के साथ सफल 

बनाना चाहिए विश्वामित्र ने राम को उपदेश देते हुए कहा यह राम तुम्हारे भीतर ज्ञान तो बहुत है लेकिन तुम अपनी शक्ति को समझ नहीं पा रहे हो इसलिए तुम्हें बल की साधना करनी चाहिए सबल होना चाहिए इसके लिए तुम्हें चंडी साधना भी करनी पड़ेगी और शिव अभिषेक भी करना पड़ेगा तभी तो शक्ति के साथ बल प्राप्त कर पाओगे हमारे शास्त्रों में भी कई जगह पर कहा गया है मनुष्य तुम बलवान बनो तुम्हें बल की प्राप्ति करनी चाहिए 

नारद ने ऋषि सनत कुमार से पूछा बल किस प्रकार प्राप्त करना चाहिए और इसका क्रम क्या है तब उन्होंने कहा जब शिष्य गुरु के पास जाता है तब उसे नाम ज्ञान की दीक्षा दी जाती है लेकिन यह है मंत्रवित तो है लेकिन आत्मवित  नहीं है तब नारद ने पूछा इससे बड़ा क्या है ऋषि ने कहा इससे बड़ी है वाणी, इसी को दूसरे रूप में शब्द भी कहा जाता है और शब्दों को ब्रह्म के समान माना जाता है ऋषि सनत कुमार ने |नारद से 

आगे कहा वाणी से बड़ा है मन,क्योकि मन से किया गया कार्य ही पूर्ण सफलता प्राप्त कराता है इसके बिना सफलता भी प्राप्त नहीं हो सकती तब नारद ने पूछा कि मन से बड़ा क्या है ऋषि ने कहा मन से बड़ा है संकल्प क्योंकि संकल्प के बिना कोई भी क्रिया पूर्ण रुप से संपन्न नहीं होती इसलिए संकल्प बड़ा है संकल्प के द्वारा ही व्यक्ति परम लक्ष्य को अवश्य ही प्राप्त कर लेता है लेकिन संकल्प से भी बड़ा होता है चित्त होता है 
सनत्कुमार का नारद को ज्ञान 
क्योंकि यह संकल्प हमारे चित्त में रहता है और किसी वस्तु का रहने का स्थान बड़ा माना जाता है  इसके आगे सनत कुमार ने कहा हे नारद चित्त से भी बड़ा  ध्यान होता है क्योंकि इस सारी सृष्टि में सब अपने-अपने काम में मगन है यह अंतरिक्ष आकाश, जल, अग्नि, धरती, वायु, पर्वत, देव, मनुष्य सभी अपने-अपने ध्यान में गतिशील होते हुए ध्यान मग्न है इसलिए इस संसार में गति है और जहां ध्यान गति है उसे कोई नहीं रोक 

सकता तब नारद ने पूछा फिर ध्यान से भी बड़ा क्या है तब ऋषि सनत कुमार ने कहा इससे बड़ा है विज्ञान से ही हम सब कुछ ज्ञात करते हैं यही संपूर्ण ब्रह्म  है लेकिन यह परमतत्व विज्ञान नहीं है क्योंकि इससे बड़ा बल होता है इसे प्राप्त करने के लिए गुरु धूमावती, कभी बगुलामुखी, कभी काली साधना और कभी कमला साधना, मातंगी साधना कराते रहते हैं जिससे हमारे अंदर जो बल समाप्त हो गया है उसे पुनः दुबारा से प्राप्त 

किया जा सके सनत कुमार ने आगे कहा इस बल से भी बड़ा अन्न  होता है या अनाज होता है क्योंकि बिना अन्न के हमें बल कहां से प्राप्त होगा अन्न ही वह वस्तु है जिसे खाकर हमें शक्ति प्राप्त होती है बिना अन्न के हमारी बुद्धि मन शरीर सब कुछ काम करना बंद कर देंगे और इससे भी बड़ी वस्तु है उसका नाम है वर्षा क्योंकि बिना अन्न उत्पन्न नहीं हो सकता और बिना जल के जीवन की कल्पना करना भी व्यर्थ है एक बार के लिए 

व्यक्ति भूखा रह सकता है मगर जल के बिना जिंदा नहीं रह सकता आगे बताते हुए ऋषि ने कहा इस जल से भी बड़ा अगर कोई तत्व है तो उसका नाम है अग्नि इसके माध्यम से ही प्रकाश उत्पन्न होता है और प्रकाश से ही सभी फसलें उत्पन्न होती हैं और इसके माध्यम से ही हमारी भूख शांत होती है इसलिए प्रकाश या अग्नि उससे भी बड़ा तत्व है तब नारद ने कहा क्या इससे भी बड़ा कुछ और बल होता है तब ऋषि ने उत्तर दिया अग्नि 

से बड़ा होता है आकाश बिना आकाश के कोई भी शब्द हमें सुनाई नहीं पड़ सकता और इसके बिना कोई भी वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा नहीं कर सकती इसलिए आकाश तत्व बहुत बड़ी वस्तु है इसके कारन हि किसी वाटू का विस्तार देखा जा सकता है और इसी के माध्यम से ध्वनि का आवागमन संभव है उन्होंने आगे बताते हुए कहा  कि अगर आकाश से भी बड़ा कुछ है तो उसका नाम स्मृति है क्योंकि बिना स्मृति के हम कुछ 

भी याद नहीं रख पाएंगे और ना ही किसी चीज को पहचान पाएंगे हमारे अंदर कई कई जन्मों की स्मृति भरी पड़ी है बिना इसके हम एक दूसरे को पहचान ही नहीं सकते वास्तव में हमारी भावना हमारा ज्ञान हमारा बल सब कुछ विस्मृति के आधार पर ही तो है स्मृति के भटकाव के कारण ही मनुष्य भटकता है तब नारद ने पूछा क्या इससे भी बड़ा कुछ है तब ऋषि ने कहा हे नारद इससे भी बड़ी जो चीज है उसका नाम है आशा क्योंकि 

हमारी स्मृति का संबंध भूतकाल की घटनाओं से होता है लेकिन हमारी आशा स्मृति को साथ लेकर भविष्य से जोड़ती है हमारे जीवन में माता पिता आए और समय के अनुसार वह चले भी जाएंगे लेकिन हमारी स्मृति में वह हमेशा शेष रहते हैं लेकिन हम अपने जीवन में शांति कैसे प्राप्त करेंगे यह तो केवल और केवल आशा के द्वारा ही संभव है उन्होंने आगे बताया कि कोई भी व्यक्ति किसी के बिछड़ जाने से या हानि लाभ के 
प्राण ही केंद्र बिंदु है 
कारण मरता नहीं लेकिन जब मनुष्य में आशा का संचार समाप्त हो जाता है तो वह व्यक्ति वास्तव में मर जाता है आशा के कारण ही मनुष्य सारे कर्म करता है आशा से ही संतान, धन, मान सम्मान  की इच्छा उत्पन्न होती है आशा के कारण ही इस लोक में और परलोक में प्राप्ति की इच्छा होती है इसलिए इस सृष्टि में सब कुछ आशा से ही चल रहा है जब हम उनके पास जाते हैं तो इसी आशा और भावना के साथ जाते हैं कि हमें 

ईश्वर की प्राप्ति हो तब गुरु आशीर्वाद से अमोघ फल की प्राप्ति होती है और वह अपनी कामना में पूर्ण रूप से सफल हो पाता है इसलिए आशा ही वह वस्तु है तब नारद ने पूछा इससे भी बड़ा कुछ है तब ऋषि ने जवाब देते हुए कहा इस आशा से बड़ा होता है प्राण क्योंकि यह प्राण वह वस्तु है जिसके कारण  हमारा शरीर जीवित रहता है इसी प्राण में हमारा भूत वर्तमान और भविष्य तीनों रहते हैं प्राण को पिता माना गया है, प्राण को 

ही माता माना गया है, प्राण को ही भ्राता कहा गया है, प्राण को ही आचार्य कहा गया है, प्राण को ही ब्राह्मण कहा है और प्राण ही संपूर्ण ब्रह्म है इसलिए हे नारद प्राण से बड़ा कुछ भी नहीं है इसलिए ऊपर कही हुई बातें एक से एक उच्चतर स्थिति के बल है इन्हें ध्यान में रखकर ही व्यक्ति को जीवन की साधना करनी चाहिए और जीवन में प्राण साधना करते हुए सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है इसलिए नारद प्राण ही संपूर्ण ब्रह्म है जिसे 

जानकर व्यक्ति सब कुछ जान जाता है फिर उसके आगे कुछ भी शेष नहीं रहता संसार में प्रत्येक व्यक्ति जीव जंतु को प्राणी कहा गया है क्योंकि इसमें प्राण तत्व होता है और वह प्राणी जिसने अपने भीतर इस प्राणतत्व को पहचान करने की क्षमता प्राप्त कर ली वह स्वतः ही सुख से परिपूर्ण हो जाता है और आनंद को प्राप्त कर लेता है वह अपने भीतर ही भीतर अपने आप को पा लेता है जो हमारा केंद्र बिंदु है जिसे जानने के लिए हम बाहर 

भटक रहे हैं उसे प्राणतत्व के माध्यम से पहचाना जा सकता है हमने अपने जीवन का लक्ष्य धन कमाना संतान उत्पन्न करना समृद्धि प्राप्त करना और संसार से चले जाना बना लिया है यह बहुत सारे दोष बंधन हमने अपने इस प्राणतत्व पर आरोपित कर लिए हैं हमने अपनी भावनाओं के अपने विचारों के अपने कर्मों की यादें, आशा , बल, अभिमान सब कुछ इस प्राणतत्व पर आरोपित कर दिए हैं तभी तो इस प्राणतत्व का प्रकाश हम नहीं देख पाते

इस प्राणतत्व को हम समझ नहीं पाते अगर हम निरंतर इस पर विचार करें कि मैं ही ब्रह्म हूं, मैं ही सारी सृष्टि हूं, मेरे प्राण ही इस धरती का केंद्र बिंदु है इस प्रकार से विचार करने पर बल प्राप्त करके प्राण तत्व तक पहुच जायेगे |

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